विश्लेषण

असली जीवन की ओर वापसी: क्यों आज की पीढ़ी फिल्टर और दिखावे से दूर भाग रही है?

पुराने मोबाइल फोन की वापसी से लेकर 'डी-इन्फ्लुएंसिंग' तक, दिखावे की डिजिटल दुनिया को छोड़ अब युवा असलियत को गले लगा रहे हैं।
Molly Se-kyung

सालों तक सोशल मीडिया पर फिल्टर की हुई ‘परफेक्ट’ तस्वीरों और बिना रुके स्क्रॉलिंग के दौर के बाद, अब समाज में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। इंस्टाग्राम पर बिना एडिट की गई तस्वीरों से लेकर पुराने ‘फ्लिप फोन’ के दोबारा चलन में आने तक, लोग अब डिजिटल थकान से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। इंटरनेट से हर वक्त जुड़े रहने की इस होड़ के बीच, यह बदलाव दिखाता है कि लोग अब बनावटी दुनिया के बजाय असली पलों और गहरे रिश्तों को अहमियत देने लगे हैं। यह केवल एक छोटा सा चलन नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी का अपने समय और मानसिक शांति को वापस पाने का एक बड़ा प्रयास है।

पुराने जमाने की तकनीक और स्क्रीन से आजादी की जंग। आज के दौर में जब हर तरफ अत्याधुनिक स्मार्टफोन का बोलबाला है, युवाओं को पुराने डिस्पोजेबल कैमरे और बीस साल पुराने फ्लिप फोन के साथ देखना एक दिलचस्प नजारा है। तकनीक के ये पुराने साधन अब एक विरोध के प्रतीक के रूप में उभर रहे हैं। यह स्क्रीन की दुनिया से खुद को बाहर निकालने और अपना ध्यान दोबारा केंद्रित करने का एक तरीका है। इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर भी अब लोग बनावटी और बेहद सजी-धजी तस्वीरों के बजाय अपनी साधारण और असली जिंदगी के पलों को साझा करना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। यह डिजिटल दुनिया की उस ‘परफेक्ट’ छवि को तोड़ने की कोशिश है जो अक्सर हमें अधूरा महसूस कराती है।

दिखावटी खुशियों का अंत और सच्चाई की जीत। यह बदलाव पिछले कुछ वर्षों से धीरे-धीरे शुरू हुआ था। जब पूरी दुनिया पाबंदियों के दौर से गुजर रही थी और जीवन केवल ऑनलाइन सिमट गया था, तब लोगों ने दूसरों की चकाचौंध भरी जिंदगी को देख-देखकर ऊब महसूस करना शुरू किया। उस दौर में जब कुछ मशहूर हस्तियों ने अपनी आलीशान पार्टियों की तस्वीरें साझा कीं, तो लोगों ने उन्हें हकीकत से दूर और संवेदनहीन बताया। इसके ठीक उलट, दर्शकों ने उन लोगों को पसंद करना शुरू किया जो अपनी कमियों, बिना मेकअप वाली तस्वीरों और संघर्षों के बारे में खुलकर बात करते थे। अब दर्शकों की उम्मीदें बदल गई हैं और वे दिखावे के बजाय भरोसे और ईमानदारी को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं।

मानसिक स्वास्थ्य और ‘डी-इन्फ्लुएंसिंग’ की नई लहर। इस पूरी लहर के पीछे एक बहुत बड़ी वजह मानसिक स्वास्थ्य भी है। जो पीढ़ी सोशल मीडिया के साथ बड़ी हुई है, वह अब हर वक्त ‘ऑनलाइन’ रहने के तनाव और दबाव को महसूस कर रही है। यह समझ अब और गहरी हो रही है कि डिजिटल दुनिया में अपनी एक बनावटी छवि बनाए रखना अक्सर चिंता और अकेलेपन को जन्म देता है। इसी का नतीजा है कि ‘डी-इन्फ्लुएंसिंग’ का चलन शुरू हुआ है, जहाँ लोग अब बेकार के उत्पादों को खरीदने और दिखावे वाली जीवनशैली पर सवाल उठा रहे हैं। असलियत को अपनाना अब केवल एक पसंद नहीं, बल्कि अपनी मानसिक स्थिति को बेहतर रखने का एक तरीका बन गया है।

तकनीक और जीवन के बीच एक नया संतुलन। अब लोग कार्यस्थलों और निजी जीवन में भी थकान, मानसिक स्वास्थ्य और अपनी चुनौतियों पर खुलकर बात करने लगे हैं। हमेशा ‘बेस्ट’ दिखने का दबाव अब कम हो रहा है और इसकी जगह ईमानदारी ले रही है। बड़ी कंपनियाँ और ब्रांड भी इस बदलाव को समझ रहे हैं और लोगों का भरोसा जीतने के लिए अब वे भी वास्तविकता के करीब रहने की कोशिश कर रहे हैं। यह खामोश क्रांति तकनीक को छोड़ने के बारे में नहीं है, बल्कि उसका सही और सचेत तरीके से इस्तेमाल करने के बारे में है। आज की इस आभासी दुनिया में, असलियत के साथ जीना ही आपकी अपनी पहचान और समय पर नियंत्रण रखने की सबसे बड़ी पहचान बन गई है।

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