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प्यार की कला में रोमांटिक चोर तो है, पर चुराने लायक दिल नहीं

रेजाई कारागोज़ की 2024 की यह फ़िल्म पूर्व प्रेमियों की आँख-मिचौली है, जो कभी जमती नहीं।
Martha O'Hara
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“प्यार की कला” की कहानी एक वाक्य में कही जा सकती है। इंटरपोल की एक अधिकारी को पता चलता है कि जिस कला-चोर के पीछे वह लंबे समय से लगी है, वह उसका पूर्व प्रेमी है। इसके बाद वह उसे रंगे हाथों पकड़ने की योजना बनाती है। अलिन के किरदार में एसरा बिल्गिच हैं और चोर गुनेय के किरदार में बिरकान सोकुल्लु। निर्देशक रेजाई करागोज़ की इस फ़िल्म का तुर्की नाम “Romantik Hırsız” है, यानी “रोमांटिक चोर”। पटकथा पेलिन करामेहमेतोग्लु ने लिखी है, और फ़िल्म 14 मार्च 2024 को नेटफ्लिक्स पर आई। इसे रोमांस, एक्शन और ड्रामा, तीनों श्रेणियों में रखा गया है। देखते हुए समझ नहीं आता कि यह प्रेम-कहानी है, पीछा करने का खेल है या चोरी की वारदात। लगता है कि फ़िल्म ने ख़ुद भी इनमें से किसी एक को चुनने की ज़हमत नहीं उठाई।

तुर्की नाम से ही अंदाज़ा हो जाता है कि फ़िल्म किस मिज़ाज की होना चाहती थी: एक रूमानी चोर और उसके पीछे लगी अफ़सर की आँख-मिचौली। शीर्षक में जो छेड़छाड़ भरा, हल्का स्वर है, वह परदे पर बहुत कम सुनाई देता है। शूटिंग जून 2023 में चेक गणराज्य के प्राग में शुरू हुई, फिर इस्तांबुल पहुँची और जुलाई 2023 में पूरी हो गई। दो देशों में शूटिंग का फ़ायदा कहानी को मिलना चाहिए था। मुझे प्राग और इस्तांबुल पृष्ठभूमि से आगे कुछ बनते नहीं दिखे। जगहें बदल दी जाएँ तो भी कथानक लगभग वैसा ही चलता। चोर और अफ़सर के रिश्ते पर शहर की कोई छाप नहीं दिखती; कथा का कोई मोड़ इन शहरों के माहौल से नहीं निकलता। मध्य यूरोप का एक शहर और दो महाद्वीपों के बीच बसा एक शहर, इन दो अलग मिज़ाजों से एक चोरी-कथा को कितना कुछ मिल सकता था, यह सोचकर निराशा ही होती है।

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कथानक की दिक़्क़त यह है कि वह अपने सबसे दिलचस्प विचार को छूकर आगे बढ़ जाता है। पीछा करने वाली और पीछा किया जाने वाला कभी प्रेमी रहे हों, यह अपने आप में अच्छा आधार है। इसमें पुराना लगाव और आज की दुश्मनी एक ही दृश्य में टकरा सकते थे। फ़िल्म इस टकराव को खोदती नहीं। अलिन और गुनेय की कहानी पहले से सोचे हुए रास्ते पर चलती है और शायद ही कभी चौंकाती है। रोमांस और एक्शन का पलड़ा भी बराबर नहीं रहता। जिस फ़िल्म का केंद्र प्रेम होना चाहिए, उसमें वही हिस्सा सबसे फीका है। कई जगह रफ़्तार ढीली पड़ती है और ध्यान भटकने लगता है।

इस आधार में एक नैतिक खिंचाव भी छिपा है। अलिन का पेशा उसे क़ानून की तरफ़ खड़ा करता है, जबकि गुनेय की पहचान क़ानून तोड़ने से बनी है, और दोनों के बीच बीता हुआ प्यार अब भी हिसाब माँगता है। ऐसी जोड़ी की हर बातचीत दो परतों पर चल सकती है: ऊपर से सरकारी पूछताछ, भीतर से अधूरी बात। रोमांटिक थ्रिलर की पूरी बनावट इसी दोहरेपन पर टिकती है। फ़िल्म इस दोहरेपन का कम ही इस्तेमाल करती है, इसलिए पेशे और भावना की टक्कर काग़ज़ पर ही रह जाती है।

रंगे हाथों पकड़ने की योजना पूरी फ़िल्म का तनाव बन सकती थी, पर दर्शक के भीतर वह बेचैनी नहीं जगा पाती। ऐसी कहानियों का मज़ा इसी में होता है कि हम जाल बिछते हुए देखें और साथ ही सोचें कि शिकार कहाँ फिसलेगा। यहाँ योजना एक औपचारिक कार्यक्रम जैसी लगती है, जिसे बस निपटाना है। अगर जाल बिछाने वाली अफ़सर अपने ही अतीत से जूझती दिखती, तो वही योजना कहानी को गति देती और उसमें जान भी डालती। तब हर क़दम पर एक सवाल रहता: वह अपना काम कर रही है या पुरानी चोट का हिसाब चुका रही है? फ़िल्म यह सवाल पूछती ही नहीं, इसलिए जवाब की ज़रूरत भी नहीं पड़ती।

फ़िल्म में सबसे ज़्यादा देखने लायक़ चीज़ दोनों मुख्य कलाकार हैं। बिरकान सोकुल्लु गुनेय को हल्के-फुल्के अंदाज़ में निभाते हैं, और चोर की यह बेफ़िक्री कहानी में थोड़ी हवा भर देती है। एसरा बिल्गिच अलिन में सधी हुई लगती हैं, पर लिखावट उन्हें उतनी जगह नहीं देती जितनी इस किरदार को चाहिए थी। दोनों साथ हों तो परदे पर एक ठहराव आता है, ख़ासकर उन पलों में जब कोई भी खुलकर वह नहीं कह पाता जो उसके मन में है। मुश्किल यह है कि पटकथा ऐसे पल बहुत कम जुटाती है। जोड़ी की यह ताक़त पीछा करने और योजनाएँ बनाने के बीच दब जाती है। दो पूर्व प्रेमियों की आपसी केमिस्ट्री ही इस फ़िल्म का असली सौदा होनी चाहिए थी, और वह सौदा आधा ही पूरा होता है।

सहायक भूमिकाओं में फ़िरात तानिश फ़ैसल बने हैं और उशान चाकिर ओज़ान। उनके साथ वेरा के रूप में निल केसेर, ओमेर के रूप में हकान उम्मक और मुख्य कार्यकारी की भूमिका में उस्मान अल्काश हैं। ये सब मुख्य जोड़ी के आसपास घूमते हैं, पर कहानी में इनकी जगह साफ़ नहीं बन पाती। देखते हुए मुझे कई बार लगा कि इन किरदारों को क्यों रखा गया है, और इनके बिना कहानी में क्या कम हो जाता। इसका दोष कलाकारों को नहीं दिया जा सकता। पटकथा ने उन्हें करने को कुछ ठोस दिया ही नहीं। जब सहायक पात्र सिर्फ़ नाम और पदनाम बनकर रह जाएँ, तो मुख्य जोड़ी अकेली पड़ जाती है और फ़िल्म की हर कमी उन्हीं दोनों के खाते में लिखी जाने लगती है।

समीक्षकों ने भी फ़िल्म को ज़्यादा पसंद नहीं किया। रॉटन टोमेटोज़ पर पाँच समीक्षाओं में से सिर्फ़ 20 प्रतिशत सकारात्मक हैं, और औसत रेटिंग 10 में 4.3 है। सबसे सख़्त फ़ैसला कॉमन सेंस मीडिया की बार्बरा शुल्गासर-पार्कर का है, जिन्होंने पाँच में सिर्फ़ एक स्टार दिया। सिनेमा एक्सप्रेस के लिए मृणाल राजाराम ने पाँच में दो दिए। Cinematographe.it की स्वेवा दी पाल्मा 2.6 स्टार पर रुकीं, और न्यूज़18 के गौतमन भास्करन ने पाँच में 2.5 दिए। यानी ज़्यादातर अंक औसत के आसपास या उससे नीचे हैं। सबसे ऊँचा अंक द ईस्टर्न इको की मरियम फ़ख़्रेद्दीन का है, जिन्होंने 10 में 6.5 दिए। यह भी औसत से थोड़ा ही ऊपर है, इसे ख़ास तारीफ़ नहीं कहा जा सकता। मेरा अपना अनुभव इन अंकों से बहुत अलग नहीं रहा।

पूर्व प्रेमियों के बीच चोर और पुलिस का रिश्ता अच्छा विचार था। पर प्रेम वाला हिस्सा ठंडा पड़ा रहता है और पीछा करने वाला हिस्सा कभी रफ़्तार नहीं पकड़ता। कहानी अनुमानित रास्ते पर चलती रहती है। सोकुल्लु और बिल्गिच कुछ देर बाँधे रखते हैं, पर इतनी कमज़ोर नींव पर कोई जोड़ी पूरी फ़िल्म खड़ी नहीं कर सकती। नेटफ्लिक्स पर बिना ज़्यादा उम्मीद के एक शाम बितानी हो, तो यह चल जाएगी। लेकिन अलिन और गुनेय का पुराना रिश्ता ही इसकी असली जान हो सकता था, और पटकथा ने उसी पर सबसे कम मेहनत की।

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तस्वीरें: The Movie Database (TMDB)

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