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ड्रीम एक प्यारी स्पोर्ट्स कॉमेडी है, जो कोच से ज़्यादा अपनी टीम के दम पर चमकती है

ली ब्योंग-हुन की 2023 की फ़िल्म बेघर खिलाड़ियों की सच्ची कहानी को गर्मजोशी से कहती है, पर चौंकाती नहीं।
Martha O'Hara
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ली ब्योंग-हन की ‘ड्रीम’ (2023) एक सीधे सवाल पर खड़ी है: अगर एक चिड़चिड़े कोच के हाथ में बेघर लोगों की टीम थमा दी जाए तो क्या होगा? पार्क सेओ-जुन यहाँ यून हॉन्ग-दे बने हैं, जिन्हें अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद बेघर लोगों की राष्ट्रीय फ़ुटबॉल टीम की ज़िम्मेदारी मिलती है। मंज़िल है होमलेस वर्ल्ड कप, और फ़िल्म 2010 के उस टूर्नामेंट से जुड़ी एक सच्ची घटना पर आधारित मानी जाती है।

टीम के सदस्य किसी खेल-अकादमी से नहीं आए हैं। कुछ ने कभी गेंद को छुआ तक नहीं, और कुछ का स्वभाव इतना अजीब और अड़ियल है कि उन्हें एक टीम की शक्ल देना ही पहली चुनौती बन जाता है। फ़िल्म की कॉमेडी यहीं से निकलती है, क्योंकि कोच इन खिलाड़ियों से उतना ही तंग है जितने खिलाड़ी उससे। हॉन्ग-दे शुरू में इस काम को लेकर शक में रहता है और बेरुखी दिखाता है। धीरे-धीरे वह टीम के प्रति नरम पड़ता है। यह रास्ता पहचाना हुआ है, और निर्देशक इसे नया दिखाने का ढोंग नहीं करते, जो मुझे ईमानदार लगा।

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फ़िल्म की एक समझदारी यह है कि वह इन लोगों को सिर्फ़ दया की नज़र से नहीं देखती। वह मेहनत और लगन पर ज़ोर देती है: ये लोग टीम इसलिए बनाते हैं कि उन्हें खेलना है, इसलिए नहीं कि उन्हें किसी की सहानुभूति चाहिए। इस तरह बेघर होना यहाँ एक कठिन हालात की तरह दिखता है, किसी किरदार की पूरी पहचान की तरह नहीं। सवाल यह ज़रूर बनता है कि क्या एक सामाजिक मुद्दे को इतनी जल्दी खेल की कहानी में घुला देना ठीक है। मेरे हिसाब से फ़िल्म उस मुद्दे को पूरी तरह टटोलती नहीं, पर उसका मज़ाक भी नहीं उड़ाती।

पार्क सेओ-जुन का हॉन्ग-दे बाहर से रूखा है, पर उस रूखेपन के नीचे थकान और झुँझलाहट भी दिखती है, और इसी वजह से वह सिर्फ़ एक कड़क कोच बनकर नहीं रह जाता। हास्य के क्षणों में वे हल्के रहते हैं और भावुक क्षणों में ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर नहीं लगाते। किरदार की नरमी अचानक नहीं फूटती; वह धीरे-धीरे सामने आती है, इसलिए अंत तक भरोसे लायक़ लगती है। इस भूमिका की तैयारी के लिए उन्होंने जिम में मेहनत की, पर पर्दे पर ज़्यादा काम उनके हाव-भाव का दिखता है।

IU ने ली सो-मिन की भूमिका निभाई है, एक वीडियोग्राफ़र जो हॉन्ग-दे और उसकी टीम पर डॉक्यूमेंट्री बना रही है और जिसका अपना करियर भी ठहराव में है। यह जोड़ कहानी को दिलचस्प बनाता है, क्योंकि कैमरे के सामने जो हो रहा है और कैमरे के पीछे जो चल रहा है, दोनों के बीच एक तनाव बनता है। इसी डॉक्यूमेंट्री की बदौलत कोच एक तरह से टीवी का चेहरा भी बन जाता है, और फ़िल्म हल्के ढंग से पूछती है कि कहानी जब कैमरे के लिए गढ़ी जाने लगे तो उसमें कितनी सच्चाई बचती है। IU का अभिनय संयमित है और वे पार्क के सामने दबती नहीं। फिर भी सो-मिन का किरदार मुझे कुछ अधूरा लगा। उसके ठहराव की वजह और उसका असर फ़िल्म जितना दिखा सकती थी, उतना नहीं दिखाती।

सहायक कलाकारों में किम जोंग-सू, को चांग-सोक, जुंग सेउंग-गिल, ली ह्यून-वू, यांग ह्यून-मिन और होंग वान-प्यो जैसे नाम हैं, और टीम का माहौल इनके आपसी तालमेल से बनता है। कमी यह है कि चेहरे इतने हैं कि कई किरदार रेखाचित्र भर रह जाते हैं। कुछ खिलाड़ी याद रह जाते हैं, कुछ सिर्फ़ टीम की भीड़ का हिस्सा बने रहते हैं। उनके अतीत और उनकी वजहों को थोड़ा और समय मिलता, तो टीम का भावुक पक्ष ज़्यादा ठोस होता।

रफ़्तार फ़िल्म की दूसरी कमज़ोरी है। बीच के हिस्से में कहानी ढीली पड़ती है और कुछ दृश्य ज़रूरत से लंबे खिंचते हैं। हॉन्ग-दे के सामने एक आकर्षक प्रस्ताव आता है जो उसे कोचिंग से दूर ले जा सकता था, पर यह मोड़ जितना असर डाल सकता था, उतना नहीं डालता, क्योंकि दर्शक पहले से जानता है कि वह किस तरफ़ झुकेगा।

आख़िरी हिस्से में टीम यूरोप पहुँचती है और असली टूर्नामेंट शुरू होता है। यहाँ तक आने में फ़िल्म जो समय लेती है, उसका फ़ायदा इसी हिस्से में मिलता है, क्योंकि हम उन चेहरों को पहले से जानते हैं जो मैदान पर उतरते हैं। टीम कप नहीं जीतती, पर आख़िरी मुक़ाबलों में उसका खेल स्टेडियम के दर्शकों और डॉक्यूमेंट्री देखने वालों, दोनों का दिल जीत लेता है। फ़िल्म यही कहना चाहती है कि जीत-हार से ज़्यादा यह मायने रखता है कि ये लोग उस मंच तक पहुँचे। कोरिया लौटकर हॉन्ग-दे और सो-मिन, दोनों का करियर फिर पटरी पर आता है, और यह अंत थोड़ा सुविधाजनक ज़रूर है, पर फ़िल्म के हल्के मिज़ाज से मेल खाता है।

‘ड्रीम’ 26 अप्रैल 2023 को दक्षिण कोरिया में सिनेमाघरों में आई और बॉक्स ऑफ़िस पर पहले स्थान से शुरू हुई। बाद में न्यूयॉर्क एशियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में इसे सेंटरपीस प्रस्तुति के तौर पर दिखाया गया, और अब यह नेटफ़्लिक्स पर भी उपलब्ध है।

कुल मिलाकर ‘ड्रीम’ खेल-फ़िल्मों के पुराने साँचे में ही चलती है: हास्य, खिलाड़ियों की सनक और एक रूखे आदमी का नरम पड़ना। यह सब अक्सर सलीक़े से होता है, और पार्क सेओ-जुन की मौजूदगी इसे सँभाले रखती है। हल्की-फुल्की, इंसानी गर्मजोशी वाली स्पोर्ट्स कॉमेडी चाहिए तो एक शाम इसके साथ बुरी नहीं गुज़रेगी।

कलाकार

तस्वीरें: The Movie Database (TMDB)

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