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The Name of the Rose आज भी एक रोमांचक मध्यकालीन रहस्य है, पर किताब से ज़्यादा ठंडी

जीन-जैक्स एनो की 1986 की फ़िल्म, उम्बर्तो इको के उपन्यास पर आधारित, शॉन कॉनरी के दमदार अभिनय के साथ।
Martha O'Hara
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फ्रांसिस्कन भिक्षु विलियम ऑफ बास्कर्विल एक मठ में पहुँचते हैं और पाते हैं कि वहाँ कई भिक्षु रहस्यमय हालात में मारे जा चुके हैं। यह The Name of the Rose की कहानी है, जो 1986 में जीन-जैक्स एन्नो के निर्देशन में बनी। आधार उंबर्तो एको का 1980 में छपा पहला उपन्यास है, जिसकी दुनिया भर में पाँच करोड़ से ज़्यादा प्रतियाँ बिक चुकी हैं। समय चौदहवीं सदी का है। मेरे लिए यह ऐतिहासिक पोशाकों की नुमाइश कम है और सत्ता के साये में चलती जासूसी पहेली ज़्यादा।

विलियम अपने नौसिखिए शिष्य एड्सो ऑफ मेलक के साथ एक सम्मेलन में भाग लेने मठ आते हैं। पहुँचते ही उन्हें पता चलता है कि कई भिक्षु संदिग्ध हालात में मारे जा चुके हैं। सच तक पहुँचने के लिए विलियम को चर्च के अधिकार के सामने खड़ा होना पड़ता है और मठ के भीतर पल रही गुप्त साज़िश से भी भिड़ना पड़ता है। उनके पास हथियार के नाम पर बस अपनी बुद्धि है। लड़ाई बराबरी की नहीं है, और तनाव इसी असंतुलन से पैदा होता है।

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सीन कॉनरी ने विलियम को बहुत संयम से निभाया है। वे अपनी समझदारी का ढिंढोरा नहीं पीटते, और जो लोग सच पर अपना एकाधिकार मानते हैं, उनके सामने भी न हड़बड़ाते हैं, न दबते हैं। उनकी यही ठंडक मुझे सबसे भली लगी। क्रिस्चियन स्लेटर का एड्सो दुनिया को पहली बार देख रहे युवक जैसा है, और दर्शक उसी की आँखों से मठ में दाख़िल होते हैं। यह चुनाव ठीक बैठता है। विलियम को अपने निष्कर्ष ज़ोर से बोलने के लिए एक श्रोता मिल जाता है, और फ़िल्म को दर्शक को सीधे समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

एफ़. मरे अब्राहम बर्नार्डो गुई बने हैं, जो फ़िल्म में चर्च की सत्ता का चेहरा है। गुई जिज्ञासा से जाँच नहीं करता; उसकी सत्ता को सवाल पूछने की ज़रूरत ही नहीं लगती। एक तरफ़ सबूत से चलने वाला दिमाग़ है, दूसरी तरफ़ विश्वास से चलने वाला। यह टकराव मुझे फ़िल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा लगा। लाशों की गिनती से ज़्यादा देर तक मेरे मन में यही सवाल टिका रहा कि सच तय करने का हक़ किसके पास है।

मठ के बाक़ी चेहरे छोटे हिस्सों में आते हैं, पर उनसे बंद समुदाय का एहसास बनता है। रॉन पर्लमैन का सल्वाटोर, माइकल लॉन्सडेल का मठाधीश, एलिया बास्किन के सेवेरिनुस, विलियम हिकी के उबेर्तिनो दा कासाले, वोल्कर प्रेख़टेल के मालाखिया और हेल्मुट क्वाल्टिंगर के रेमीजियो दा वारागीने। इन सबके पास पर्दे पर कम समय है, फिर भी हर कोई कुछ जानता हुआ और कुछ छिपाता हुआ लगता है। मठ की हर बातचीत में कुछ अनकहा रह जाता है, और बंद दीवारों के भीतर वही अनकहा सबसे भारी पड़ता है।

फ़ेओदोर शालियापिन जूनियर ने योर्गे दे बुर्गोस को निभाया है। एको के उपन्यास में योर्गे हँसी को ईश्वर के तय किए क्रम के लिए ख़तरा मानता है, और यह किरदार उसी डर का चेहरा है। मुझे शालियापिन जूनियर की सख़्त आस्था याद रही, जिससे मुझे सचमुच डर लगा। उनकी स्थिरता से लगता है कि इस आदमी को अपने सही होने पर रत्ती भर शक नहीं, और ऐसा आदमी ही सबसे ख़तरनाक होता है।

एको का उपन्यास घना है: भूलभुलैया जैसा पुस्तकालय है, छिपाई गई किताबें हैं और ऐसे लोग हैं जो ज्ञान के उजागर होने के डर से हत्या करने को तैयार हैं। इतनी सामग्री को फ़िल्म में समेटना आसान नहीं था। मैंने फ़िल्म को उसकी अपनी शर्तों पर देखा, उपन्यास के हर प्रसंग की गिनती किए बिना। उसमें जो बचा है, वह कहानी की रीढ़ है: जानना चाहने वालों और रहस्य छिपाने वालों की टक्कर। इसी टक्कर की वजह से यह जासूसी कहानी सिर्फ़ क़ातिल की तलाश बनकर नहीं रह जाती।

फ़िल्म की कमज़ोरियाँ इसी घनी सामग्री से निकलती हैं। कहानी में बहुत से सहायक पात्र हैं, और हर किसी को इतना समय नहीं मिलता कि दर्शक उसके इरादे समझ सके। कुछ जगह गति धीमी पड़ जाती है और सिरा हाथ से छूटने लगता है; ज़रा ध्यान भटका तो याद रखना कठिन हो जाता है कि कौन-सा सुराग़ किस मौत से जुड़ा था। कुछ अभिनय-निर्णय भी ज़रूरत से ज़्यादा खिंचे लगे। पर्लमैन का सल्वाटोर कभी-कभी कैरिकेचर की ओर झुक जाता है और उस ऐतिहासिक माहौल को हिला देता है जिसे फ़िल्म ने मेहनत से रचा है। फिर भी ये ख़ामियाँ फ़िल्म को बिगाड़ने लायक नहीं हैं।

फ़िल्म चर्च की सत्ता को तीखी नज़र से देखती है और इस सवाल से बचती नहीं। कॉनरी का संयम, स्लेटर की मासूमियत और अब्राहम की ठंडी कठोरता मुझे तब भी बाँधे रखती है जब रफ़्तार थम जाती है। जिन्हें हर दस मिनट में कोई मोड़ चाहिए, वे बीच में ऊब सकते हैं। पर जिन्हें सुराग़ों के बीच बैठकर सोचना अच्छा लगता है, उनके लिए यह फ़िल्म देखने लायक़ है।

कलाकार

तस्वीरें: The Movie Database (TMDB)

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