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The Ninth की सेंट पीटर्सबर्ग झलक लाजवाब है, मगर रहस्य की कहानी में छेद ही छेद हैं

निकोलाय खोमेरिकी की 2019 की ऑकल्ट थ्रिलर माहौल और डेज़ी हेड के दम पर चलती है, पटकथा के दम पर नहीं।
Martha O'Hara
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निकोलाय खोमेरिकी की “द नाइंथ” उन्नीसवीं सदी के आख़िरी दौर के सेंट पीटर्सबर्ग में घटती है। उस शहर पर तंत्र-विद्या और अध्यात्मवाद का जुनून सवार है। ब्रिटिश मीडियम ओलिविया रीड (डेज़ी हेड) दौरे पर रूसी साम्राज्य की राजधानी पहुँचती हैं, और उनके सार्वजनिक सेशनों में भीड़ उमड़ पड़ती है। उसी समय शहर में रस्मी ढंग की रहस्यमय हत्याएँ हो रही हैं। लड़कियों को सड़कों से उठा लिया जाता है और उनकी क्षत-विक्षत लाशें अलग-अलग इलाक़ों में मिलती हैं। जाँच का ज़िम्मा युवा पुलिस अधिकारी सेर्गेई रोस्तोव (येव्गेनी त्सिगानोव) के पास है, और उनके सहायक फ्योदोर गानिन उनका साथ देते हैं। हर नई लाश के साथ मामला और उलझता है, और शक रोस्तोव को ओलिविया तक ले आता है। वे इस उम्मीद में उसके पास जाते हैं कि उसकी असली या दिखावटी शक्ति मरे हुए लोगों की आत्माओं को बुलाकर क़ातिल का सुराग़ दे सकेगी।

फ़िल्म की शुरुआत एक ऐसे प्रोलॉग से होती है जो इंडियाना जोंस की याद दिलाता है: एक खोए हुए रेगिस्तानी शहर तक का साहसिक सफ़र। मोरिया रिव्यूज़ ने इसे इसी रूप में दर्ज किया है। मेरी नज़र में यह शुरुआत फ़िल्म के साथ पूरी तरह न्याय नहीं करती, क्योंकि इसके बाद कहानी अँधेरी जासूसी कथा में उतर जाती है और दोनों हिस्सों का मिज़ाज आपस में मेल नहीं खाता। आगे का घटनाक्रम सीधा है। रोस्तोव ओलिविया से निजी मुलाक़ात माँगते हैं और उसे धोखेबाज़ ठहराकर गिरफ़्तार कर लेते हैं। फिर पता चलता है कि उसमें सचमुच दिव्य दृष्टि है, और दोनों मिलकर क़ातिल का पीछा करने लगते हैं। मोरिया के अनुसार क़ातिल शहर में पंचकोण की शक्ल में नौ नरबलियाँ देकर कोई तांत्रिक आह्वान पूरा करना चाहता है। फ़िल्म का नाम इसी गिनती से जुड़ता है।

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सबसे ज़्यादा असर फ़िल्म के शहर का है। मोरिया रिव्यूज़ के मुताबिक़ लगभग हर फ़्रेम पुरानी इमारतों के सामने बना है, या ऐसी गलियों से भरा है जिनमें काली बग्घियाँ दौड़ रही हैं। गार्गोयल की मूर्तियों के सामने खड़े पात्र हैं, नहरों में तैरती लाशें हैं और मूर्तियों के पास सलीक़े से सजाए गए शव हैं। फ़िल्म ब्लिट्ज़ भी इस चित्रण को शुरू से सराहती है: अभिजात वर्ग की हवेलियों से लेकर ग़रीबों और अपराधियों की बस्तियों तक, समाज की हर परत इसमें दर्ज है। कैमरा बार-बार इमारतों, नहरों और मूर्तियों पर लौटता है, और दर्शक उन्हीं के सहारे उस दौर में उतरता है।

ओलिविया का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन इस शैली का सबसे साफ़ नमूना है। मोरिया के मुताबिक़ वह किसी साधारण हॉल में नहीं, ओपेरा हाउस में होता है। काली पोशाक और गहरे काजल में सजी ओलिविया के हाथ अचानक लपटों में घिर जाते हैं और उसके चारों ओर आग का घेरा बन जाता है। मोरिया के अनुसार खोमेरिकी इस पूरे दृश्य को बड़े असर के साथ खड़ा करते हैं। फ़िल्म ब्लिट्ज़ ने ठीक पकड़ा है कि यह प्रदर्शन तमाशे के पहलू पर ज़ोर देता है, पर साथ ही यह भी जता देता है कि उसकी अलौकिक क्षमता असली है।

कमज़ोरी पटकथा में है। “मनोवैज्ञानिक पुलिस की मदद करता है” वाली फ़िल्मों की पुरानी बीमारी यहाँ भी है: कहानी को जब भी जानकारी चाहिए, मीडियम के पास वह आ जाती है, सिर्फ़ इसलिए कि वह मीडियम है। फ़िल्म ब्लिट्ज़ इसे सीधे आलसी लेखन कहता है, और मैं इससे सहमत हूँ। यहाँ तो ओलिविया की शक्ति के नियम भी टिके नहीं रहते। पहले बताया जाता है कि वह हाल ही में मरे लोगों की आत्माओं से संदेश पाती है। अंत में अचानक ज़िंदा लोग भी, ज़रूरत पड़ने पर, उसे संदेश भेजने लगते हैं। फ़िल्म ब्लिट्ज़ को यह भी अजीब लगा कि जब रोस्तोव उससे मिलने आते हैं तो असली शक्ति वाली ओलिविया उन्हें धोखा देने की कोशिश क्यों करती है। ऐसी गड़बड़ियाँ दर्शक को कहानी से बाहर खींच लाती हैं। मोरिया की बात इसी से जुड़ती है: शैलीगत सजावट हटा दो तो फ़िल्म उसी राह पर चलती है जिस पर दिव्यदृष्टि वाली लड़की और जासूस की बाक़ी थ्रिलर चलती आई हैं।

अभिनय मिला-जुला है। डेज़ी हेड की ओलिविया रोज़मर्रा की हक़ीक़त से कुछ कटी हुई लगती है, और यही किरदार की ज़रूरत थी। उन्हें पूरी फ़िल्म में सिर्फ़ अंग्रेज़ी बोलने दी गई है, जो समझदारी भरा फ़ैसला है। इसकी क़ीमत त्सिगानोव को चुकानी पड़ती है। फ़िल्म ब्लिट्ज़ के मुताबिक़ दूसरी भाषा में उनका अभिनय अपनी मातृभाषा वाले अभिनय से कुछ क़दम पीछे है। बाक़ी कलाकार ख़ास छाप नहीं छोड़ते, और खलनायक के बारे में फ़िल्म ब्लिट्ज़ की शिकायत है कि वह अधूरा गढ़ा हुआ लगता है। यूरी कोलोकोलनिकोव का शौक़िया तांत्रिक वासिली गोलित्सिन और जोनाथन साल्वे का जेम्स रीड कहानी में मौजूद ज़रूर हैं, पर इन किरदारों को उभरने की जगह कम मिलती है।

मोरिया रिव्यूज़ के अनुसार यह खोमेरिकी की छठी फ़िल्म है। उनकी शुरुआत विज्ञान-कथा “977” (2006) से हुई थी। उसके बाद उन्होंने “ए टेल इन द डार्कनेस”, “हार्ट्स बूमरैंग”, “द आइसब्रेकर” और “सेल्फ़ी” जैसे ड्रामा बनाए, जिनमें “सेल्फ़ी” एक ऐसे आदमी की कहानी है जिसकी ज़िंदगी उसका हमशक्ल हथिया लेता है। इसलिए दृश्य गढ़ने की उनकी क्षमता पर शक नहीं होता, पर इस बार वह कहानी से ज़्यादा माहौल में खर्च हुई है। पीटर्सबर्ग की इमारतें, नहरें और ओपेरा हाउस का आग वाला दृश्य फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी याद रहते हैं। फ़िल्म ब्लिट्ज़ इसे औसत से नीचे आँकता है, और कारण वही असंगतियाँ हैं। हत्यारे की तलाश वाली बाक़ी कहानियों से इसे अलग करती है बस तंत्र-मंत्र की हल्की परत और दौर का माहौल। देखने लायक यहाँ पीटर्सबर्ग की सूरत और डेज़ी हेड का अभिनय है; पटकथा उनके स्तर तक नहीं पहुँचती।

कलाकार

तस्वीरें: The Movie Database (TMDB)

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